प्रकृति का क़हर
प्रकृति का कहर तो देखिए जरा
सबको घरों के अंदर कैद कर दिया
जो कभी रुके ना घरों में किसी के कहने पर
वो भी आज घरों मै रुकने को मजबूर हो गए
माना कि इस कोरोना ने दहशत मचा दी
पर आज परिंदे आजाद हुए बेफिक्र उड़ने लगे
जिस दिल्ली मै परिंदे दिखते थे कभी कभी
आज उनकी चहचहा ने नीद से उठा दिया
जहा दिखता था सिर्फ काला पानी बहता हुआ
आज उन नदियों मे भी डॉल्फिन दिखाने लगे
ऐ प्रकृति तूने भी क्या खेल कर डाला
शहर को गांव बना सब पहले जैसा कर डाला
इस भीड़ भाड़ वाली जगह में जो गायब हो रहे थे
आज वो कहीं चलने कहीं तैरने तो कहीं उड़ने लगे है
जो अब भी ना समझे हम और करते रहे यही खफा
फिर यूहीं एक कहर आयेगा सब उथल पूथल कर जाएगा।
LET'S LEARN TO CO-EXIST.
- संजय ✍️

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