हम सब एक कठपुतली के समान हैं


 

हर इंसान एक पुतला के समान है 

जिसे कुछ भी नहीं पता होता जिदंगी में 

क्या करना है, कैसे आगे बढ़ना है ।

 उसकी जिंदगी में दो लोगों का बहुत अहम

 रोल  होता है ' मां - बाप और प्रेमिका' । 

'मां - बाप' उसे सजाते है संवारते है दुनियां से लड़ना और ऊंचाइयों तक पहुंचना सीखते है और उन ऊंचाइयों से लोगो का हित करना सिखाते है फिर कुछ समय  बाद एक लड़की आती है 

कभी प्रेमिका बनके तो कभी पत्नी बनके वो

सपोर्ट करती है, नई प्रेरणा देती है , जिस 

मुकाम की हमें अब तक प्रतीक्षा होती है वहां 

तक ले कर जाती है । अगर ये साथी अच्छी

 मिले तो हमे जो असम्भव लगता है हम 

उसे भी प्राप्त कर लेते है ,  लक्ष्य से दूरियां घटने 

लगती है , प्रतीक्षा का समय कम होने लगता है, 

घनघोर जंगल में भी एक प्रकाश दिखने लगता है ,हम हर चीज पाने का प्रयास  करने लगते है और हमें सब कुछ मिल भी जाता है और अगर वहीं साथी अच्छी ना हो तो,  हम भटक जाते है 

एक घनघोर जंगल में जिसका कोई

अंत नहीं होता , लक्ष्य तो मिलता नहीं

 बल्कि जो कुछ हमारे पास होता है 

वो भी धुएं की तरह ओझल हो कर गायब 

होने लगता है । सब कुछ मिथ्या है । 

हम सब पुरुष सच में बस एक कठपुतली 

के समान है , जिसे सजाता भी कोई और है 

संवारता भी कोई और है और चलाता भी कोई और ही है, जिसके बिना हमारा जीवन सुन्य के 

समान है, वो हमें जो करने को कहता  है 

हम सिर्फ वहीं करते है 

हम वहीं तक सीमित रह जाते है , 

कोई भी पुरुष अर्जुन जैसे महान योद्धा 

भी तभी बन पता है जब श्री कृष्ण जैसा कोई 

मार्गदर्शक साथ हो ।

©️संजय वर्मा ✍️

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