मेरी पहचान है मेरी माँ

 


क्या याद है वो बचपन का किस्सा

जो सुनकर तुम सो जाते थे या

मां का पल्लू पकड़ के तुम पीछे पीछे आते थे

क्या यादा है तूमको वो लम्हा

जब चलते चलते गिर जाते थे

दौड़ के मां आ आती थी कस के गले लगाती थी

जब जिद के तुम मालिक थे जिद्दी तुम कहलाते थे

कभी कभी जिद पूरी करती कभी जोर के चाटे पड़ते

क्या याद है वो किस्सा जब किसी से लड़ के रो जाते

तब घर से मां को बुला के लाते उसको अपना बल दिखलाते

गर्मियों के तेज तपन हो या सर्दियां वाली रात हो

मां के पल्लू में जैसे कूलर या हीटर वली बात हो

क्या याद है वो वाला किस्सा जब नाना नानी बुलाते थे

तुम मां से जिद्द कर करके नाना नानी से मिलने जाते

कितना कुछ अब बदल गया बचपन का लम्हा निकल गया

कुछ रिश्ते पीछे छूट गए कुछ अपना कहकर लूट गए

अब सब कुछ बदला बदला है जो ना बदली वो मेरी मां है

अब शाम को जब मैं फोन करू... मां पूछती कैसा है तू

फल खाया कर दूध पिया कर डेली का यही किस्सा है

जब थोड़ा सा मैं डर जाऊं या मन में कोई चिंता हो

मां हौसला दे कर कहती.. मेरा चीते तू क्यू डरता है

तू चलता जा मदमस्त राह पे मैं तेरे पीछे पीछे हूं

किसी के जुल्म के आगे बिलकुल ना झुकना मेरे बेटे

जैसे चंद्रगुप्त ने मां के खातिर नाम में अपने मौर्य लगाया

बाहुबली ने कालकेय का सिर मां के कदमों में चड़ाया

अब समय है की मैं लड़ जाऊं मां के खातिर कुछ कर जाऊं

सारी दुनियां को जीत के मैं मां के चरणो में रख जाऊं

मां तुमसे मैं हूं, तुमसे ही है ये जग सारा

दुनिया सारी चरणो में तेरी तुमसे ज्यादा कोई ना प्यारा ❤️

- संजय वर्मा ✒️


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