दास्तान ए प्लेटफार्म
सुबह सवेरे ले कर झोला स्टेशन को निकल पड़े
कान पे मफलर बदन पे स्वेटर नई दिल्ली को चल पड़े
स्टेशन पे जब हम पहुंचे लोगो की थी भीड़ बड़ी
कोई आने वाला था किसी को जाना था दूर कहीं
बच्चे बूढ़े महिलाएं चारो ओर थे लोग खड़े
कोई कैब से निकल रहा था कोई ऑटो को ढूंढ रहे
स्टेशन थोड़ा बदला सा है आधुनिकता के समय तले
टिकट काउंटर पे लोग कम थे एंट्री गेट पे खूब खड़े
छोटी सी इस भीड़ भाड़ में पूरा भारत देख लिया
कोई कन्नड़ में गुड़ गुड़ करते कुछ कनपुरिया बोल पड़े
एंट्री गेट के लाइन में हम भी जा कर खड़े हुए
धीरे धीरे चलते चलते स्कैनर तक पहुंच पड़े
ओवरब्रिज पे चलते चलते सही जगह तक पहुंच गए
13 नंबर पे ताज पकड़ने प्लेटफार्म पे चलने लगे
प्लेटफार्म पे चहल पहल की बात तुम्हे बतलाता हूं
वेंडर वाली कड़क चाय आओ तुम्हे पिलाता हूं
कुछ पानी की बॉटल लिए कुछ चाय पकोड़े बेच रहे
कुछ खड़े खड़े ही चिप्स का रैपर धीरे धीरे फाड़ रहे
पीठ पे झोला हाथ में सेल फोन ले कर कुछ हैं खड़े हुए
कुछ डाल के चादर फर्श पे है रेलगाड़ी का इंतजार किए
टी टी साहब पकड़ के कुछ को चालान है काट रहे
कुछ पैसेंजर टी टी से नजर चुरा के धीरे धीरे भाग रहे
लाल कपड़े में कुली भैया भरे बैग से लदे हुए
उनके पीछे अफसर मैडल छोटा बैग हैं लिए हुए
दो पहिया वाला रिक्सा ढेरो लगेज से भरा पड़ा
एक पीछे से धक्का दे रहा एक अगर से खीच रहा
कॉलेज का एक टूर ग्रुप ट्रेन की इंतजार में है खड़ा
कोई किसी को खीच रहा कोई किसी को पीट रहा
छोटू सा एक नन्हा बालक इधर उधर है मचल रहा
उसके दादू उसके पीछे संग है उसके खेल रहे
कुछ के झोले है फटे हुए कुछ पे है बार कोड लगे
कुछ पहिया वाला झोला लिए कुछ सिर पे बैग है लिए खड़े
कुछ मोटे मोटे चूहे इधर उधर हैं घूम रहे
कुछ पतले मोटे कुत्ते प्लेटफार्म पे टहल रहे
कोई पूछ रहे ट्रेन कब आयेगी कुछ मेट्रो का है पूछ रहे
कुछ चलती ट्रेन को पकड़ रहे कुछ पापा को है बाय करे
कुछ खाकी वर्दी पहन के निगरानी में है खड़े खड़े
कुछ काला कोट पहन कर के पैसेंजर को समझा रहे
छोटा सा ये प्लेटफार्म भारत का हाल बताता है
अमीर गरीब बूढ़े बच्चे सब को एक जगह पे लाता है
प्लेटफार्म के चबूतरे पे ये सबको साथ बिठाता है
ऊंच नीच से परे हमे समानता का पाठ पढ़ाता है।
- संजय वर्मा ✍️
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